1. दाग से छुटकारा पाने के लिए उसे बिना देरी किए हुए तुरंत ही धो लें। अगर दाग सूख गया तो वह और गहरा हो जाएगा इसलिए उसे किसी गीली नैपकिन से पोंछ लें। 2. जैसे ही दाग लगे उस पर तुरंत ही साबुन का घोल लगाना चाहिए और 3-5 मिनट के बाद धो लेना चाहिए। गीले दाग को साफ करने में आसानी होती है। 3. अगर साबुन-सर्फ से दाग नहीं जा रहें हैं तो कपड़े को गरम पानी में भिगों दें और उसमें 1 चम्मच बेकिंग सोडा डाल दें। कपड़े को 15-20 मिनटों तक भिगोनें के बाद धो लें। 4. अगर आप खाने के दाग को बहुत देर के बाद देख रहीं हैं और वह सूख चुका है तो बिना देरी किए हुए उसे गरम पानी में डालकर उसमें सर्फ मिला दें। पर ध्यान रहे की आप कपड़ों पर दिए गए निर्देशों को जरुर पढ़ लें। 5. गरम पानी और सर्फ से धोने के बाद अगर फिर भी दाग रह जाते हैं तो उसे पानी से निकाल कर उस पर थोडा सा ब्लीचिंग पाउडर तब तक रगड़े जब तक वह दाग छूट न जाए। 6. आप चाहें तो तेल के गहरे दाग को छुडाने के लिए उसपर नींबू को रगड़ सकती हैं। इसके अलावा गरम पानी में नमक भी मिला सकती हैं पर नमक से कपड़े फेड हो जाते हैं इसलिए पहले थोडा सा नमक कपड़े के कोनों में लगा कर देख लें और फिर इसको इस्तमाल करें।Mobile Duniya
बादाम, गुलाब के फूल, चिरौंजी और पिसा जायफल रात को दूध में भिगो दें। सुबह इसे पीसकर इसका उबटन लगाएँ। इससे चेहरे के दाग-धब्बे मिटते हैं और त्वचा कांतिमय बनती है।
* चंदन, गुलाब जल, पोदीने का रस एवं अंगूर का रस मिलाकर पेस्ट बनाएँ और उसे चेहरे पर लगाएँ। कुछ देर बाद ठंडे पानी से चेहरा धो लें। इस फेस पैक से चेहरे की झुर्रियाँ मिटती हैं।
* धूप में अक्सर हमारी त्वचा झुलस जाती है और काली पड़ जाती है। त्वचा के रंग को पहले की तरह बनाने के लिए आम के पत्ते, जामुन, दारूहल्दी, गुड़ और हल्दी की बराबर मात्रा मिलाकर उसका पेस्ट बनाकर पूरे शरीर पर लगाएँ। कुछ समय रखने के बाद स्नान कर लें। इस लेप से त्वचा की रंगत निखरती है।
* दो चम्मच सोयाबीन का आटा, एक बड़ा चम्मच दही व शहद मिलाकर पेस्ट बनाएँ तथा इस मिश्रण को कुछ देर चेहरे पर लगाकर चेहरा धो लें। इससे त्वचा में कसावट आती है।
* नीम की पत्तियाँ, गुलाब की पत्तियाँ, गेंदे का फूल सभी को एक कटोरी पानी में उबालें तथा इस रस को चेहरे पर लगाएँ। इससे मुहाँसे निकलना बंद हो जाते हैं।
* चंदन, गुलाब जल, पोदीने का रस एवं अंगूर का रस मिलाकर पेस्ट बनाएँ और उसे चेहरे पर लगाएँ। कुछ देर बाद ठंडे पानी से चेहरा धो लें। इस फेस पैक से चेहरे की झुर्रियाँ मिटती हैं।
* धूप में अक्सर हमारी त्वचा झुलस जाती है और काली पड़ जाती है। त्वचा के रंग को पहले की तरह बनाने के लिए आम के पत्ते, जामुन, दारूहल्दी, गुड़ और हल्दी की बराबर मात्रा मिलाकर उसका पेस्ट बनाकर पूरे शरीर पर लगाएँ। कुछ समय रखने के बाद स्नान कर लें। इस लेप से त्वचा की रंगत निखरती है।
* दो चम्मच सोयाबीन का आटा, एक बड़ा चम्मच दही व शहद मिलाकर पेस्ट बनाएँ तथा इस मिश्रण को कुछ देर चेहरे पर लगाकर चेहरा धो लें। इससे त्वचा में कसावट आती है।
* नीम की पत्तियाँ, गुलाब की पत्तियाँ, गेंदे का फूल सभी को एक कटोरी पानी में उबालें तथा इस रस को चेहरे पर लगाएँ। इससे मुहाँसे निकलना बंद हो जाते हैं।
जय सांई राम़।।।
दो पके मीठे सेब बिना छीले प्रातः खाली पेट चबा-चबाकर खाने से गुस्सा शान्त होता है। पन्द्रह दिन लगातार खायें। थाली बर्तन फैंकने वाला और पत्नि और बच्चों को मारने पीटने वाला क्रोधी भी क्रोध से मुक्ति पा सकेगा।
जिन व्यक्तियों के मस्तिष्क दुर्बल हो गये हो और जिन विद्यार्थियों को पाठ याद नहीं रहता हो तो इसके सेवन से थोड़े ही दिनों में दिमाग की कमजोरी दूर होती है और स्मरण शक्ति बढ़ जाती है। साथ ही दुर्बल मस्तिष्क के कारण सर्दी-जुकाम बना रहता हो, वह भी मिट जाता है।
कहावत है - "एक सेब रोज खाइए, वैद्य डाक्टर से छुटकारा पाइए।"
या आंवले का मुरब्बा एक नग प्रतिदिन प्रातः काल खायें और शाम को गुलकंद एक चम्मच खाकर ऊपर से दुध पी लें। बहुत क्रोध आना बन्द होगा।
अपना सांई प्यारा सांई सबसे न्यारा अपना सांई
ॐ सांई राम।।।http://forum.spiritualindia.org/
दो पके मीठे सेब बिना छीले प्रातः खाली पेट चबा-चबाकर खाने से गुस्सा शान्त होता है। पन्द्रह दिन लगातार खायें। थाली बर्तन फैंकने वाला और पत्नि और बच्चों को मारने पीटने वाला क्रोधी भी क्रोध से मुक्ति पा सकेगा।
जिन व्यक्तियों के मस्तिष्क दुर्बल हो गये हो और जिन विद्यार्थियों को पाठ याद नहीं रहता हो तो इसके सेवन से थोड़े ही दिनों में दिमाग की कमजोरी दूर होती है और स्मरण शक्ति बढ़ जाती है। साथ ही दुर्बल मस्तिष्क के कारण सर्दी-जुकाम बना रहता हो, वह भी मिट जाता है।
कहावत है - "एक सेब रोज खाइए, वैद्य डाक्टर से छुटकारा पाइए।"
या आंवले का मुरब्बा एक नग प्रतिदिन प्रातः काल खायें और शाम को गुलकंद एक चम्मच खाकर ऊपर से दुध पी लें। बहुत क्रोध आना बन्द होगा।
अपना सांई प्यारा सांई सबसे न्यारा अपना सांई
ॐ सांई राम।।।http://forum.spiritualindia.org/
गुरूर्ब्रह्मा गुरूर्विष्णुः गुरूर्देवो महेश्वरः।
गुरूर्साक्षात परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः।।
अर्थः गुरू ही ब्रह्मा हैं, गुरू ही विष्णु हैं। गुरूदेव ही शिव हैं तथा गुरूदेव ही साक्षात् साकार स्वरूप आदिब्रह्म हैं। मैं उन्हीं गुरूदेव के नमस्कार करता हूँ।
ध्यानमूलं गुरोर्मूर्तिः पूजामलं गुरोः पदम्।
मंत्रमूलं गुरोर्वाक्यं मोक्षमूलं गुरोः कृपा।।
अर्थः ध्यान का आधार गुरू की मूरत है, पूजा का आधार गुरू के श्रीचरण हैं, गुरूदेव के श्रीमुख से निकले हुए वचन मंत्र के आधार हैं तथा गुरू की कृपा ही मोक्ष का द्वार है।
अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम्।
तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः।।
अर्थः जो सारे ब्रह्माण्ड में जड़ और चेतन सबमें व्याप्त हैं, उन परम पिता के श्री चरणों को देखकर मैं उनको नमस्कार करता हूँ।
त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्वं मम देव देव।।
अर्थः तुम ही माता हो, तुम ही पिता हो, तुम ही बन्धु हो, तुम ही सखा हो, तुम ही विद्या हो, तुम ही धन हो। हे देवताओं के देव! सदगुरूदेव! तुम ही मेरा सब कुछ हो।
ब्रह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिं
द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्त्वमस्यादिलक्ष्यम्।
एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षिभूतं
भावातीतं त्रिगुणरहितं सदगुरूं तं नमामि।।
अर्थः जो ब्रह्मानन्द स्वरूप हैं, परम सुख देने वाले हैं, जो केवल ज्ञानस्वरूप हैं, (सुख-दुःख, शीत-उष्ण आदि) द्वंद्वों से रहित हैं, आकाश के समान सूक्ष्म और सर्वव्यापक हैं, तत्त्वमसि आदि महावाक्यों के लक्ष्यार्थ हैं, एक हैं, नित्य हैं, मलरहित हैं, अचल हैं, सर्व बुद्धियों के साक्षी हैं, सत्त्व, रज, और तम तीनों गुणों के रहित हैं – ऐसे श्री सदगुरूदेव को मैं नमस्कार करता हूँ।
सरस्वती-वंदना
माँ सरस्वती विद्या की देवी है। गुरूवंदना के पश्चात बच्चों को सरस्वती वंदना करनी चाहिए।
या कुन्देन्दुतषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना।
या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाङयापहा।।
अर्थः जो कुंद के फूल, चन्द्रमा, बर्फ और हार के समान श्वेत हैं, जो शुभ्र वस्त्र पहनती हैं, जिनके हाथ उत्तम वीणा से सुशोभित हैं, जो श्वेत कमल के आसन पर बैठती हैं, ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि देव जिनकी सदा स्तुति करते हैं और जो सब प्रकार की जड़ता हर लेती हैं, वे भगवती सरस्वती मेरा पालन करें।
शुक्लां ब्रह्मविचारसारपरमामाद्यां जगदव्यापिनीं
वीणापुस्तकधारिणीमभयदां जाङयान्धकारापहाम्।
हस्ते स्फाटिकमालिकां च दधतीं पद्मासने संस्थितां
वन्दे तां परमेश्वरीं भगवती बुद्धिप्रदां शारदाम्।।
अर्थः जिनका रूप श्वेत है, जो ब्रह्मविचार की परमतत्त्व हैं, जो सब संसार में व्याप्त रही हैं, जो हाथों में वीणा और पुस्तक धारण किये रहती हैं, अभय देती हैं, मूर्खतारूपी अंधकार को दूर करती हैं, हाथ में स्फटिक मणि की माला लिये रहती हैं, कमल के आसन पर विराजमान हैं और बुद्धि देनेवाली हैं, उन आद्या परमेश्वरी भगवती सरस्वती की मैं वंदना करता हूँ।
सदुगुरू महिमा
श्री रामचरितमानस में आता हैः
गुरू बिन भवनिधि तरहिं न कोई। जौं बिरंधि संकर सम होई।।
भले ही कोई भगवान शंकर या ब्रह्मा जी के समान ही क्यों न हो किन्तु गुरू के बिना भवसागर नहीं तर सकता।
सदगुरू का अर्थ शिक्षक या आचार्य नहीं है। शिक्षक अथवा आचार्य हमें थोड़ा बहुत एहिक ज्ञान देते हैं लेकिन सदगुरू तो हमें निजस्वरूप का ज्ञान दे देते हैं। जिस ज्ञान की प्राप्ति के मोह पैदा न हो, दुःख का प्रभाव न पड़े एवं परब्रह्म की प्राप्ति हो जाय ऐसा ज्ञान गुरूकृपा से ही मिलता है। उसे प्राप्त करने की भूख जगानी चाहिए। इसीलिए कहा गया हैः
गुरूगोविंद दोनों खड़े, किसको लागूँ पाय।
बलिहारी गुरू आपकी, जो गोविंद दियो दिखाय।।
गुरू और सदगुरू में भी बड़ा अंतर है। सदगुरू अर्थात् जिनके दर्शन और सान्निध्य मात्र से हमें भूले हुए शिवस्वरूप परमात्मा की याद आ जाय, जिनकी आँखों में हमें करूणा, प्रेम एवं निश्चिंतता छलकती दिखे, जिनकी वाणी हमारे हृदय में उतर जाय, जिनकी उपस्थिति में हमारा जीवत्व मिटने लगे और हमारे भीतर सोई हुई विराट संभावना जग उठे, जिनकी शरण में जाकर हम अपना अहं मिटाने को तैयार हो जायें, ऐसे सदगुरू हममें हिम्मत और साहस भर देते हैं, आत्मविश्वास जगा देते हैं और फिर मार्ग बताते हैं जिससे हम उस मार्ग पर चलने में सफल हो जायें, अंतर्मुख होकर अनंत की यात्रा करने चल पड़ें और शाश्वत शांति के, परम निर्भयता के मालिक बन जायें।
जिन सदगुरू मिल जाय, तिन भगवान मिलो न मिलो।
जिन सदगरु की पूजा कियो, तिन औरों की पूजा कियो न कियो।
जिन सदगुरू की सेवा कियो, तिन तिरथ-व्रत कियो न कियो।
जिन सदगुरू को प्यार कियो, तिन प्रभु को प्यार कियो न कियो।
दिनचर्या
1. बालकों को प्रातः सूर्योदय से पहले ही उठ जाना चाहिए। उठकर भगवान को मनोमन प्रणाम करके दोनों हाथों की हथेलियों को देखकर इस श्लोक का उच्चारण करना चाहिएः कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्यै सरस्वती। करमूले तु गोविन्दः प्रभाते करदर्शनम्।।
अर्थः हाथ के अग्रभाग में लक्ष्मी का निवास है, मध्य भाग में विद्यादेवी सरस्वती का निवास है एवं मूल भाग में भगवान गोविन्द का निवास है। अतः प्रभात में करदर्शन करना चाहिए।
2. शौच-स्नानादि से निवृत्त होकर प्राणायाम, जप, ध्यान, त्राटक, भगवदगीता का पाठ करना चाहिए।
3. माता-पिता एवं गुरूजनों को प्रणाम करना चाहिए।
4. नियमित रूप से योगासन करना चाहिए।
5. अध्ययन से पहले थोड़ी देर ध्यान में बैठें। इससे पढ़ा हुआ सरलता से याद रह जाएगा। जो भी विषय पढ़ो वह पूर्ण एकाग्रता से पढ़ो।
6. भोजन करने से पूर्व हाथ-पैर धो लें। भगवान के नाम का इस प्रकार स्मरण करें- ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्। ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना।।
प्रसन्नचित्त होकर भोजन करना चाहिए। बाजारू चीज़ नहीं खानी चाहिए। भोजन में हरी सब्जी का उपयोग करना चाहिए।
7. बच्चों को स्कूल में नियमित रूप से जाना चाहिए। अभ्याम में पूर्ण रूप से ध्यान देना चाहिए। स्कूल में रोज-का-रोज कार्य कर लेना चाहिए।
8. शाम को संध्या के समय प्राणायाम, जप, ध्यान एवं सत्साहित्य का पठन करना चाहिए।
9. रात्रि के देर तक नहीं जागना चाहिए। पूर्व और दक्षिण दिशा की ओर सिर रखकर सोने से आयु बढ़ती है। भगवन्नाम का स्मरण करते-करते सोना चाहिए।
अब जो कहानी मैं आप लोगों को सुनाने जा रहा हूँ वह है एक ऐसे आदमी की जिसको पता नहीं क्या सूझा कि वह शादी करने के लिए एक चुड़ैल के पीछे ही पड़ गया। वह उस चुड़ैल को पाने के लिए बहुत सारे हथकंडे अपनाए....पर क्या वह सफल हुआ? क्या वह चुड़ैल उससे शादी करने के लिए राजी हुई? आइए इस रहस्य पर से परदा उठाते हैं......।
बात कोई 13-14 साल पुरानी है और मेरे मित्र की माने तो एकदम सही। अरे इतना ही नहीं, मेरे मित्र के अलावा और भी कई लोग इस घटना को बनावटी नहीं सच्ची मानते हैं। कुछ लोगों का तो यह भी कहना है कि मेरे मित्र और चुड़ैल के बीच जो रोमांचक बातें हो रही थी उसके वे लोग भी गवाह हैं क्योंकि उन लोगों ने वे सारी बातें सुनी।
तो आइए अब आपका वक्त जाया न करते हुए मैं अपने मित्र रमेश के मुखारबिंदु से सुनी इस घटना को आप लोगों को सुनाता हूँ।
उस समय रमेश की उम्र कोई 22-23 साल थी और आप लोगों को तो पता ही है कि गाँवों में इस उम्र में लोग बच्चों के बाप बन जाते हैं मतलब परिणय-बंधन में तो बँध ही जाते हैं।
हाँ तो रमेश की भी शादी हुए लगभग 4-5 साल हो गए थे और ढेड़-दो साल पहले ही उसका गौना हुआ था। उस समय रमेश घर पर ही रहता था और अपनी एम.ए. की पढ़ाई पूरी कर रहा था।
यह घटना जब घटी उस समय रमेश एक 20-25 दिन की सुंदर बच्ची का पिता बन चुका था। हाँ एक बात मैं आप लोगों को बता दूँ कि रमेश की बीबी बहुत ही निडर स्वभाव की महिला थी। यह गुण बताना इसलिए आवश्यक था कि इस कहानी की शुरुवात में इसकी निडरता अहम भूमिका निभाती है।
एक दिन की बात है कि रमेश की बीबी ने अपनी निडरता का परिचय दिया और अपनी नन्हीं बच्ची (उम्र लगभग एक माह से कम ही) और रमेश को बिस्तर पर सोता हुआ छोड़ चार बजे सुबह उठ गई। (गाँवों में आज-कल तो लोग पाखाना-घर बनवाने लगे हैं पर 10-12 साल पहले तक अधिकतर घरों की महिलाओं को नित्य-क्रिया (दिशा-मैदान) हेतु घर से बाहर ही जाना पड़ता था और घर की सब महिलाएँ नहीं तो कम से कम दो एक साथ घर से बाहर निकलती थीं। ये महिलाएँ सभी लोगों के जगने से पूर्व ही (बह्म मुहूर्त में) जगकर खेतों की ओर चली जाती थीं।)
ऐसा नहीं था कि रमेश की बीबी पहली बार चार बजे जगी थी, अरे भाई वह प्रतिदिन चार बजे ही जगती थी पर निडरता का परिचय इसलिए कह रहा हूँ कि और दिनों की तरह उसने घर के किसी महिला सदस्य को जगाया नहीं और अकेले ही दिशा मैदान हेतु घर से बाहर निकल पड़ी। (दरअसल गाँव में लड़कोरी महिला (जच्चा) जिसका बच्चा अभी 6 महीना तक का न हुआ हो उसको अलवाँती बोलते हैं और ऐसा कहा जाता है कि ऐसी महिला पर भूत-प्रेत की छाया जल्दी पड़ जाती है या भूत-प्रेत ऐसी महिला को जल्दी चपेट में ले लेते हैं। इसलिए ये अलवाँती महिलाएँ जिस घर में रहती हैं वहाँ आग जलाकर रखते हैं या कुछ लोग इनके तकिया के नीचे चाकू आदि रखते हैं।)
खैर रमेश की बीबी ने अपनी निडरता दिखाई और वह निडरता उसपर भारी पड़ी। वह अकेले घर से काफी दूर खेतों की ओर निकल पड़ी। हुआ यह कि उसी समय पंडीजी के श्रीफल (बेल) पर रहनेवाली चुड़ैल उधर घूम रही थी और न चाहते हुए भी उसने रमेश की बीबी पर अपना डेरा डाल दिया। हाँ फर्क सिर्फ इतना था कि वह पहले दूर-दूर से ही रमेश की बीबी का पीछा करती रही पर अंततः उसने अपने आप को रोक नहीं पाई और ज्यों ही रमेश की बीबी घर पहुँची उस पर सवार हो गई।
रमेश भी लगभग 5 बजे जगा और भैंस आदि को चारा देने के लिए घर से बाहर चला गया। जब वह घर में वापस आया तो अपनी बीबी की हरकतों में बदलाव देखा। उसने देखा कि उसकी बच्ची रो रही है पर उसकी बीबी आराम से पलंग पर बैठकर पैर पसारे हुए कुछ गुनगुना रही है।
रमेश एकबार अपनी रोती हुई बच्ची को देखा और दूसरी बार दाँत निपोड़ते और पलंग पर बेखौफ बैठी हुई अपनी बीबी को। उसको गुस्सा आया और उसने बच्ची को अपनी गोद में उठा लिया और अपनी बीबी पर गरजा,“बच्ची रो रही है और तुम्हारे कान पर जूँ तक नहीं रेंग रही है।” अरे यह क्या रमेश की बीबी ने तो रमेश के इस गुस्से को नजरअंदाज कर दिया और अपने में ही मस्त बनी रही।
रमेश का गुस्सा और बढ़े इससे पहले ही रमेश की भाभी वहाँ आ गईं और रमेश की गोदी में से बच्ची को लेते हुए उसे बाहर जाने के लिए कहा। अरे यह क्या रमेश का गुस्सा तो अब और भी बढ़ गया, उसे समझ में नहीं आ रहा था कि आज क्या हो रहा है, जो औरत (उसकी बीबी) अपने से बड़ों के उस घर में आते ही पलंग पर से खड़ी हो जाती थी वही बीबी आज उसके भाभी के आने के बाद भी पलंग पर आराम से बैठे मुस्कुरा रही है।
खैर रमेश तो कुछ नहीं समझा पर उसकी भाभी को सबकुछ समझ में आ गया और वे हँसने लगी। रमेश को अपनी भाभी का हँसना मूर्खतापूर्ण लगा और वह अपने भाभी से बोल पड़ा, “अरे आपको क्या हुआ? ये उलटी-पुलटी हरकतें कर रही है और आप हैं कि हँसे जा रही हैं।” रमेश के इतना कहते ही उसकी भाभी ने उसे मुस्कुराते हुए जबरदस्ती बाहर जाने के लिए कहा और यह भी कहा कि बाहर से दादाजी को बुला लीजिए।
भाभी के इतना कहते ही कि दादाजी को बुला लाइए, रमेश सब समझ गया और वह बाहर न जाकर अपनी बीबी के पास ही पलंग पर बैठ गया। इतने ही देर में रमेश के घर की सभी महिलाएँ वहाँ एकत्र हो गई थीं और अगल-बगल के घरों के भी कुछ नर-नारी। अरे भाई गाँव में इन सब बातों को फैलते देर नहीं लगती और तो और अगर बात भूत-प्रेत की हो तो और भी लोग मजे ले लेकर हवाईजहाज की रफ्तार से खबर फैलाते हैं।
हाँ तो अब मैं आप को बता दूँ कि रमेश के कमरे में लगभग 10-12 मर्द-औरतों का जमावड़ा हो चुका था और रमेश ने भी सबको मना कर दिया कि यह खबर खेतों की ओर गए दादाजी के कान तक नहीं पहुँचनी चाहिए। दरअसल वह अपने आप को लोगों की नजरों में बहुत बुद्धिमान और निडर साबित करना चाहता था। वह तनकर अपनी बीबी के सामने बैठ गया और अपनी बीबी से कुछ जानने के लिए प्रश्नों की बौछार शुरु कर दी।
रमेश, “कौन हो तुम?”
रमेश की बीबी कुछ न बोली केवल मुस्कुराकर रह गई।
रमेश ओझाओं की तरह फिर गुर्राया, “मुझे ऐसा-वैसा न समझ। मैं तुमको भस्म कर दूँगा।”
रमेश की बीबी फिर से मुस्कुराई पर इस बार थोड़ा तनकर बोली, “तुम चाहते क्या हो?”
बहुत सारे लोगों को वहाँ पाकर रमेश थोड़ा अकड़ेबाजों जैसा बोला, “ ‘तुम’मत बोल। मेरे साथ रिस्पेक्ट से बातें कर। तुम्हें पता नहीं कि मैं ब्राह्मण कुमार हूँ और उसपर भी बजरंगबली का भक्त।”
रमेश के इतना कहते ही उसकी बीबी (चुड़ैल से पीड़ित) थोड़ा सकपकाकर बोली, “मैं पंडीजी के श्रीफल पर की चुड़ैल हूँ।”
अपने बीबी के मुख से इतना सुनते ही तो रमेश को और भी जोश आ गया। उसे लगने लगा कि अब मैं वास्तव में इसपर काबू पा लूँगा। वहाँ खड़े लोग कौतुहलपूर्वक रमेश और उसकी बीबी की बातों को सुन रहे थे और मन ही मन प्रसन्न हो रहे थे, अरे भाई मनोरंजन जो हो रहा था उनका।
रमेश फिर बोला,”अच्छा। पर तूने इसको पकड़ा क्यों? तुमके पता नहीं कि यह एक ब्राह्मण की बहू है और नियमित पूजा-पाठ भी करती है।”
रमेश की चुड़ैल पीड़ित बीबी बोली, “मैंने इसको जानबूझकर नहीं पकड़ा। इसको पकड़ना तो मेरी मजबूरी हो गई थी। यह इस हालत में अकेले बाहर गई क्यों? खैर अब मैं जा रही हूँ। मैं खुद ही अब अधिक देर यहाँ नहीं रह सकती।”
रमेश अपने बीबी की इन बातों को सुनकर बोला, “क्यों क्या हुआ? डर गई न मुझसे।”
रमेश के इतना कहते ही फिर उसकी बीबी मुस्कुराई और बोली, “तुमसे क्या डर। मैं तो उससे डर रही हूँ जो इस घर पर लटक रहा है और मुझे जला रहा है। अब उसका ताप मुझे सहन नहीं हो रहा है।” (दरअसल बात यह थी कि रमेश के घर के ठीक पीछे एक पीपल का पेड़ था और गाँववाले उस पेड़ को बाँसदेव बाबा कहते थे। लोगों का विश्वास था कि इस पेड़ पर कोई अच्छी आत्मा रहती है और वह सबकी सहायता करती है। कभी-कभी तो लोग उस पीपल के नीचे जेवनार आदि भी चढ़ाते थे। और हाँ इस पीपल की एक डाली रमेश के घर के उसी कमरे पर लटकती रहती थी जिसमें रमेश की बीबी रहती थी।)
चुड़ैल (अपनी बीबी) की बात सुनकर रमेश हँसा और बोला, “जा मत यहीं रह जा। जैसे हमारी एक बीबी है वैसे ही तुम एक और।”
रमेश के इतना कहते ही वह चुड़ैल हँसी और बोली, “यह संभव नहीं है पर तुम मुझसे शादी क्यों करना चाहते हो?”
रमेश बोला, “अरे भाई गरीब ब्राह्मण हूँ। कुछ कमाता-धमाता तो हूँ नहीं। तूँ रहेगी जो थोड़ा धन-दौलत लाती रहेगी।”
रमेश के इतना कहते ही वह चुड़ैल बोली, “तुम बहुत चालू है। और हाँ यह भी सही है कि हमारे पास बहुत सारा धन है पर उसपर हमारे लोगों का पहरा रहता है अगर कोई इंसान वह धन लेना चाहे तो हमलोग उसका अहित कर देती हैं। हाँ और एक बात, और वह धन तुम जैसे जीवित प्राणियों के लिए नहीं है।”
रमेश अब थोड़ा शांत और शालीन स्वभाव में बोला, “अच्छा ठीक है, तुम जरा कृपा करके एक बात बताओ, ये भूत-प्रेत क्या होते हैं, क्या तुमने कभी भगवान को देखा है, आखिर तुम कौन हो, क्या पहले तुम भी इंसान ही थी?”
चुड़ैल भी थोड़ा शांत थी और शांत थे वहाँ उपस्थित सभी लोग। क्योंकि सबलोग इन प्रश्नों का उत्तर जानना चाहते थे।
चुड़ैल ने एक गहरी साँस भरा और कहना आरंभ किया, “भगवान क्या है, मुझे नहीं मालूम पर कुछ हमारे जैसी आत्माएँ भी होती हैं जिनसे हमलोग बहुत डरते हैं और उनसे दूर रहना ही पसंद करते हैं। हमलोग उनसे क्यों डरती हैं यह भी मुझे पता नहीं। वैसे हमलोग पूजा-पाठ करनेवाले लोगों के पास भी भटकना पसंद नहीं करते और मंत्रों आदि से भी डरते हैं।”
रमेश फिर पूछा, “खैर ये बताओ कि तुम इसके पहले क्या थी? तुम्हारा घर कहाँ था, तुम चुड़ैल कैसे बन गई।”
चुड़ैल ने रमेश की बातों को अनसुना करते हुए कहा, “नहीं, नहीं..अब मैं जा रही हूँ। अब और मैं यहाँ नहीं रूक सकती। वे आ रहे हैं।”
चुड़ैल के इतना कहते ही कोई तो कमरे में प्रवेश किया और रमेश को डाँटा,“रमेश। यह सब क्या हो रहा है? क्या मजाक बनाकर रखे हो?” रमेश कुछ बोले इससे पहले ही क्या देखता है कि उसकी बीबी ने साड़ी का पल्लू झट से अपने सर पर रख लिया और हड़बड़ाकर पलंग पर से उतरकर नीचे बैठ गई और धीरे-धीरे मेरी बेटी-मेरी बेटी कहते हुए रमेश की भाभी की गोद में से बच्ची को लेकर दूध पिलाने लगी।
रमेश ने एक दृष्टि अपने दादाजी की ओर डाला और मन ही मन बुदबुदाया,“आप को अभी आना था। सब खेल बिगाड़ दिए।आधे घंटे बाद आते तो क्या बिगड़ जाता।।।।।।”
पाठक गण,सादर नमस्कार।।
यह कहानीभूत-प्रेत की कहानियाँ यंहा से ली गयी है मुझे ये कहानी बहुत पसंद है इसलिए मेने सोचा की यह सभी के साथ शेयर की जाये आप यंहा जाकर भूतो की कहानिया काफी मात्र में देख सकते
आज एक ऐसी घटना का वर्णन सुनाने जा रहा हूँ जो भूत-प्रेत से संबंधित तो नहीं है पर है चमत्कारिक। यह घटना सुनाने के लिए मैंने कई बार लेखनी उठाई पर पता नहीं क्यों कुछ लिख नहीं पाता था..पर आज पता नहीं क्या चमत्कार हुआ कि अचानक मूड बना और मैंने इस घटना को लेखनीबद्ध कर लिया।
इस घटना की सत्यता पर उंगली नहीं उठाई जा सकती क्योंकि लेखक (मैं) स्वयं इस घटना के घटने का केंद्र था। खैर यह मैं कह रहा हूँ..हो सकता है कि आपके तर्क कुछ और हों।।....आइए....सुनते हैं...इस चमत्कारिक घटना को.....
बात 3-4 साल पहले की है जब मैं मुंबई में एक संस्थान में शोध सहायक (रीसर्च एसोसियेट) के रूप में कार्यरत था। हमारे परम मित्र राणेजी के पास एक मारूती 800 थी। हमारे 2-3 मित्र इस पर अपना हाथ साफ करते रहते थे। मुझे भी चारपहिया चलाने का शौक जगा और एकदिन मैं अपने एक मित्र दीपकजी (जो चारपहिया चलाने में पारंगत हैं) के साथ स्टेयरिंग संभाल ली। शनिवार (शनि व रवि को इस संस्थान में अवकाश रहता है) का दिन था और दोपहर का समय। सड़क पर इक्के-दुक्के लोग या वाहन ही आ जा रहे थे। मैं मारूती चला रहा था और मेरे बगल में बैठे मेरे मित्र दीपकजी मेरा मार्गदर्शन कर रहे थे। इससे पहले भी मैंने थोड़ी-बहुत चारपहिया की स्टेयरिंग घुमाई थी। पर उस दिन मुझे बहुत आनंद आ रहा था क्योंकि मैं काफी अच्छी तरह से वाहन को नियंत्रण में रखकर कैंपस की सड़कों पर दौड़ा रहा था। अरे 1-2 घंटे दौड़ाने के बाद तो मैं अपने आप को मास्टर समझने लगा और मित्र दीपकजी की बातों को अनसुना करने लगा।
हम मारूती को दौड़ाते हुए हास्टल 8 के आगे के मोड़ से मोड़कर हास्टल 5 की ओर बढ़ें। पर यह क्या सड़क पर लगभग मारूती के 20 मीटर आगे दो छात्र बात करते हुए मस्ती में बढ़े जा रहे थे। दीपकजी ने मुझे ब्रेक लेकर गाड़ी को धीमे करने के लिए कहा...पर यह क्या मेरा पैर ब्रेक पर न जाकर एक्सीलेटर पर पड़ा और गाड़ी का स्पीड 40 के लगभग हो गया। मैं बार-बार रोकने की कोशिश कर रहा हूँ पर स्पीड बढ़ते जा रही है, मैं थोड़ा घबराया पर दीपकजी तो पसीने-पसीने हो गए थे। आगे दो बच्चों की जान का खतरा मुझे सताए जा रहा था...उनको बचाने के चक्कर में लगा कि तेज गाड़ी अब सड़क किनारे के एक आम के पेड़ से टकरा जाएगी और हम दोनों की इहलीला समाप्त हो जाएगी।
इस पूरी घटना को घटने में लगभग 1 से 2 मिनट का समय लगा होगा। मैंने बजरंगबली को याद किया और आँखें बंद कर ली। दीपकजी की मानो, काटो तो खून नहीं जैसी हालत हो गई थी। प्रभु की मर्जी या आप कहेंगे भाग्य ने साथ दिया....पेंड़ से लगभग एक फुट पहले कार का एक पहिया सड़क किनारे बने नाले में गया और इसके बाद उसी साइड का पीछे का पहिया भी। वे दोनों छात्र पेड़ से एक फुट आगे निकल चुके थे। पता नहीं क्यों मुझे हंसी छूट गई और अब मैंने अपनी आँखें भी खोल ली थीं। देखते ही देखते कार ने कल्टी (उलट गई) मार दी। हुआ यूं कि एक साइड के दोनों पहियों के नाले में जाते ही कार का दूसरी तरफ का भाग भी पूरी तरह से ऊपर उठा और दो बार उटल कर नाले के उस पार चला गया। नाले के उस पार जाने के बाद भी स्टेयरिंग वाला भाग (दोनों पहिए) ऊपर हो गए थे। मुझे कहीं खरोंच भी नहीं आई थी और अभी कुछ लोग दौंड़ कर आते उससे पहले ही मैं मुस्कुराते हुए, कूदकर अपने तरफ का दरवाजा खोलकर बाहर आ गया और दीपकजी को भी हाथ देकर बाहर निकाल लिया। अब तो वहाँ लगभग 20-25 लोग भी एकत्र हो गए थे। मारूती को सीधा करके सड़क पर लाया गया। भीड़ बढ़ती गई और जिन लोगों ने भी इस घटना को देखा था वे सकते में थे...हम दोनों को सही-सलामत देखकर। इसका मतलब यह नहीं कि वे हम लोगों का अहित चाहते थे....पर जिस प्रकार यह घटना घटी वह विस्मय करनेवाली थी।
लोगों के सहानुभूतिपूर्ण प्रश्नों से बचने के लिए मैंने दीपकजी से तुरंत गाड़ी चालू करने के लिए कहा और गाड़ी चालू भी हो गई। फिर हम दोनों बैठकर देवी मंदिर (कैंपस में ही) गए। वहाँ माँ को धन्यवाद देने के साथ ही लगभग 30 मिनट तक उसकी चरणों में बैठे रहे। फिर कैंपस से बाहर निकले और गाड़ी में थोड़ा-बहुत डेंटिंग-पेंटिंग कराने के बाद उसके मालिक यानी राणेजी को सौंप दिए।।
दीपकजी के घुटने में थोड़ी चोट लगी थी पर 2-3 बार सेंकाई के बाद ठीक हो गई। पर जिस-जिसने उस घटना को देखा था...वे लोग जब भी मुझसे मिलते थे या हैं..उस घटना का जरूर जिक्र यह कहते हुए करते हैं कि वास्तव में कोई दैवीय शक्ति ने ही हमें बचाया था।
आज भी जब दीपकजी मिलते हैं और इस घटना की चर्चा होती है तो मुझे तो हँसी आ जाती है पर आज भी दीपकजी उदास हो जाते हैं और कहते हैं कि वास्तव में किसी ईश्वरी चमत्कार ने हम लोगों को बचा लिया।
क्या वास्तव में हम लोगों को हनुमानजी ने बचाया??? इसके पीछे भी एक सत्य घटना है जिसका वर्णन मैं इसके आगे के वृतांत में करूँगा।।
सादर धन्यवाद।।
इस घटना की सत्यता पर उंगली नहीं उठाई जा सकती क्योंकि लेखक (मैं) स्वयं इस घटना के घटने का केंद्र था। खैर यह मैं कह रहा हूँ..हो सकता है कि आपके तर्क कुछ और हों।।....आइए....सुनते हैं...इस चमत्कारिक घटना को.....
बात 3-4 साल पहले की है जब मैं मुंबई में एक संस्थान में शोध सहायक (रीसर्च एसोसियेट) के रूप में कार्यरत था। हमारे परम मित्र राणेजी के पास एक मारूती 800 थी। हमारे 2-3 मित्र इस पर अपना हाथ साफ करते रहते थे। मुझे भी चारपहिया चलाने का शौक जगा और एकदिन मैं अपने एक मित्र दीपकजी (जो चारपहिया चलाने में पारंगत हैं) के साथ स्टेयरिंग संभाल ली। शनिवार (शनि व रवि को इस संस्थान में अवकाश रहता है) का दिन था और दोपहर का समय। सड़क पर इक्के-दुक्के लोग या वाहन ही आ जा रहे थे। मैं मारूती चला रहा था और मेरे बगल में बैठे मेरे मित्र दीपकजी मेरा मार्गदर्शन कर रहे थे। इससे पहले भी मैंने थोड़ी-बहुत चारपहिया की स्टेयरिंग घुमाई थी। पर उस दिन मुझे बहुत आनंद आ रहा था क्योंकि मैं काफी अच्छी तरह से वाहन को नियंत्रण में रखकर कैंपस की सड़कों पर दौड़ा रहा था। अरे 1-2 घंटे दौड़ाने के बाद तो मैं अपने आप को मास्टर समझने लगा और मित्र दीपकजी की बातों को अनसुना करने लगा।
हम मारूती को दौड़ाते हुए हास्टल 8 के आगे के मोड़ से मोड़कर हास्टल 5 की ओर बढ़ें। पर यह क्या सड़क पर लगभग मारूती के 20 मीटर आगे दो छात्र बात करते हुए मस्ती में बढ़े जा रहे थे। दीपकजी ने मुझे ब्रेक लेकर गाड़ी को धीमे करने के लिए कहा...पर यह क्या मेरा पैर ब्रेक पर न जाकर एक्सीलेटर पर पड़ा और गाड़ी का स्पीड 40 के लगभग हो गया। मैं बार-बार रोकने की कोशिश कर रहा हूँ पर स्पीड बढ़ते जा रही है, मैं थोड़ा घबराया पर दीपकजी तो पसीने-पसीने हो गए थे। आगे दो बच्चों की जान का खतरा मुझे सताए जा रहा था...उनको बचाने के चक्कर में लगा कि तेज गाड़ी अब सड़क किनारे के एक आम के पेड़ से टकरा जाएगी और हम दोनों की इहलीला समाप्त हो जाएगी।
इस पूरी घटना को घटने में लगभग 1 से 2 मिनट का समय लगा होगा। मैंने बजरंगबली को याद किया और आँखें बंद कर ली। दीपकजी की मानो, काटो तो खून नहीं जैसी हालत हो गई थी। प्रभु की मर्जी या आप कहेंगे भाग्य ने साथ दिया....पेंड़ से लगभग एक फुट पहले कार का एक पहिया सड़क किनारे बने नाले में गया और इसके बाद उसी साइड का पीछे का पहिया भी। वे दोनों छात्र पेड़ से एक फुट आगे निकल चुके थे। पता नहीं क्यों मुझे हंसी छूट गई और अब मैंने अपनी आँखें भी खोल ली थीं। देखते ही देखते कार ने कल्टी (उलट गई) मार दी। हुआ यूं कि एक साइड के दोनों पहियों के नाले में जाते ही कार का दूसरी तरफ का भाग भी पूरी तरह से ऊपर उठा और दो बार उटल कर नाले के उस पार चला गया। नाले के उस पार जाने के बाद भी स्टेयरिंग वाला भाग (दोनों पहिए) ऊपर हो गए थे। मुझे कहीं खरोंच भी नहीं आई थी और अभी कुछ लोग दौंड़ कर आते उससे पहले ही मैं मुस्कुराते हुए, कूदकर अपने तरफ का दरवाजा खोलकर बाहर आ गया और दीपकजी को भी हाथ देकर बाहर निकाल लिया। अब तो वहाँ लगभग 20-25 लोग भी एकत्र हो गए थे। मारूती को सीधा करके सड़क पर लाया गया। भीड़ बढ़ती गई और जिन लोगों ने भी इस घटना को देखा था वे सकते में थे...हम दोनों को सही-सलामत देखकर। इसका मतलब यह नहीं कि वे हम लोगों का अहित चाहते थे....पर जिस प्रकार यह घटना घटी वह विस्मय करनेवाली थी।
लोगों के सहानुभूतिपूर्ण प्रश्नों से बचने के लिए मैंने दीपकजी से तुरंत गाड़ी चालू करने के लिए कहा और गाड़ी चालू भी हो गई। फिर हम दोनों बैठकर देवी मंदिर (कैंपस में ही) गए। वहाँ माँ को धन्यवाद देने के साथ ही लगभग 30 मिनट तक उसकी चरणों में बैठे रहे। फिर कैंपस से बाहर निकले और गाड़ी में थोड़ा-बहुत डेंटिंग-पेंटिंग कराने के बाद उसके मालिक यानी राणेजी को सौंप दिए।।
दीपकजी के घुटने में थोड़ी चोट लगी थी पर 2-3 बार सेंकाई के बाद ठीक हो गई। पर जिस-जिसने उस घटना को देखा था...वे लोग जब भी मुझसे मिलते थे या हैं..उस घटना का जरूर जिक्र यह कहते हुए करते हैं कि वास्तव में कोई दैवीय शक्ति ने ही हमें बचाया था।
आज भी जब दीपकजी मिलते हैं और इस घटना की चर्चा होती है तो मुझे तो हँसी आ जाती है पर आज भी दीपकजी उदास हो जाते हैं और कहते हैं कि वास्तव में किसी ईश्वरी चमत्कार ने हम लोगों को बचा लिया।
क्या वास्तव में हम लोगों को हनुमानजी ने बचाया??? इसके पीछे भी एक सत्य घटना है जिसका वर्णन मैं इसके आगे के वृतांत में करूँगा।।
सादर धन्यवाद।।
टीचर (क्लास मे पढाते हुए), "बच्चो आयकर, बिक्रीकर, भूमिकर से मिलता झुलता कोइ और शब्द बताओ।"
निशु, "सर, एक नही तीन शब्द सुने, सुनील गावासकर, सचिन तैंदुलकर और दिलीप वेंगसरकर।"
मनु,"डेडी, ज्यादा काबिल कौन है मैं या आप?"
डैडी, " मै, क्योकि मैं एक तो तुम्हारा बाप हुँ, दुसरे उम्र मे भी तुम से बडा हुँ और मेरा तजुर्बा भी तुम से ज्यादा है।"
मनु, "फ़िर तो आप जानते होगें कि अमेरिका की खोज किस ने की थी? "
डैडी, "कोलम्बस ने की थी"
मनु, "कोलम्बस के बाप ने क्यों नही की, उसका तजुर्बा तो कोलम्बस से कही ज्यादा होगी?"
एक छोटा बच्चा दुसरे बच्चे से, अगर दिन को सूर्य न निकला तो क्या होगा?
दुसरे बच्चे ने जवाब दिया, "बिजली का बिल बढ जाएगा।"
टीचर (मिन्नी से), "आज स्कूल मे देर से आने का तुमने क्या बहाना ढूंढा है?"
मिन्नी, "सर आज मै इतनी तेज दौड कर आई कि बहाना सोचने का मौका ही नही मिला।"
मरते समय पति ने अपने पत्नी को सब कुछ सच बताना चाहा । उस ने कहा " मै तुम्हे जीवन भर धोखा देता रहा। सच तो यह है कि दर्जनो औरतों से मेरे नाजायज संबंध थे।"
पत्नी बोली, "मै भी सच बताना चाहूँगी । तुम बीमारी से नही मर रहे मैने तुम्हे धीरे-धीरे असर करने वाला जहर दिया है।"
पत्नी बोली, "मै भी सच बताना चाहूँगी । तुम बीमारी से नही मर रहे मैने तुम्हे धीरे-धीरे असर करने वाला जहर दिया है।"
पत्नी: मैने आज सपनो मे देखा है कि तुम मेरे लिए हीरों का हार लाए हो, इस सपने का क्या मतलब है?
पति: आज शाम को बताऊगा। शाम को पति ने एक पैकेट पत्नी को लाकर दिया। पत्नी ने खुशी-खुशी पैकेट खोला तो उस मे एक किताब निकली । किताब का नाम था, 'सपनो का मतलब' ।
पति: आज शाम को बताऊगा। शाम को पति ने एक पैकेट पत्नी को लाकर दिया। पत्नी ने खुशी-खुशी पैकेट खोला तो उस मे एक किताब निकली । किताब का नाम था, 'सपनो का मतलब' ।
नया सिपाही (इंस्पैक्टर से), "सर ये बिलकुल गलत है कि मैं उस चोर से डर गया था।"
इंस्पैक्टर, "तो तुम उस गाडी के पिछे क्यों छिपे थे?"
नया सिपाही, "जी वह तो मैं कुत्ता देख कर छिपा था ।"
मैनेजर ने आने वाले से पूछा, " क्या तुम्हें पता नही कि आज्ञा के बिना अन्दर आना मना है।"
आने वाला, "जनाब मैं आज्ञा लेने के लिए ही अन्दर आया हूं।"
अध्यापक," बाबर भारत मे कब आया?"
बंटी, "पता नही सर।"
अध्यापक, " बोर्ड पर नही देख सकते, नाम के साथ ही लिखा है।"
बंटी, मैने सोचा, शायद वह उसका फ़ोन नम्बर है।"
एक बहानेबाज कर्मचारी का दादा उस के दफ़तर में जा कर उस के बाँस से बोला, " इस दफ़तर मे सुनिल नाम का व्यक्ति कार्य करता है, मुझे उस से मिलना है, वह मेरा पोता है।"
बाँस ने मुस्करा कर कहा, " मुझे अफ़सोस है, आप देर से आए है, वह आप के आर्थी को कंधा देने के लिए छुट्टी लेकर जा चुका है।"
सेठानी (नौकरानी से), "क्यों महारानी जी आज आने मे इतनी देर क्यों लगा दी?"
नौकरानी, "सेठानी जी मै सीढियों से गिर गई थी।"
सेठानी, "तो क्या उठने मे इतनी देर लगती है।"
| झोपड़े के द्वार पर बाप और बेटी दोनों एक बुझे हुए अलाव के सामने चुपचाप बैठे हुए थे और अन्दर बेटे कि जवान बीवी बुधिया प्रसव-वेदना से पछाड़ खा रही थी। रह-रहकर उसके मुँह से ऐसी दिल हिला देने वाली आवाज़ निकलती थी, कि दोनों कलेजा थाम लेते थे। जाड़े की रात थी, प्रकृति सन्नाटे में डूबी हुई, सारा गाँव अन्धकार में लय हो गया था। |
| घीसू ने कहा – मालूम होता है, बचेगी नहीं। सारा दिन दौड़ते ही गया, ज़रा देख तो आ। |
| माधव चिढ़कर बोला – मरना ही है तो जल्दी मर क्यों नही जाती ? देखकर क्या करूं? |
| ‘तू बड़ा बेदर्द है बे ! साल-भर जिसके साथ सुख-चैन से रहा, उसी के साथ इतनी बेवफाई!’ ‘तो मुझसे तो उसका तड़पना और हाथ-पाँव पटकना नहीं देखा जाता।’ |
| चमारों का कुनबा था और सारे गाँव में बदनाम। घीसू एक दिन काम करता तो तीन दिन आराम करता। माधव इतना कामचोर था कि आधे घंटे काम करता तो घंटे भर चिलम पीता। इसीलिये उन्हें कहीँ मज़दूरी नहीं मिलती थी। घर में मुट्ठी भर अनाज भी मौजूद हो, तो उनके लिए काम करने कि कसम थी। जब दो-चार फाके हो जाते तो घीसू पेड़ पर चढ़कर लकड़ियां तोड़ लाता और माधव बाज़ार में बेच आता। जब तक वह पैसे रहते, दोनों इधर उधर मारे-मारे फिरते। गाँव में काम कि कमी ना थी। किसानों का गाँव था, मेहनती आदमी के लिए पचास काम थे। मगर इन दोनों को उस वक़्त बुलाते, जब दो आदमियों से एक का काम पाकर भी संतोष कर लेने के सिवा और कोई चारा ना होता। अगर दोनों साधू होते, तो उन्हें सुन्तोष और धैर्य के लिए, संयम और नियम की बिल्कुल ज़रूरत न होती। यह तो इनकी प्रकृति थी। विचित्र जीवन था इनका! घर में मिट्टी के दो-चार बर्तन के सिवा और कोई सम्पत्ति नही थी। फटे चीथ्डों से अपनी नग्नता को ढांके हुए जीये जाते थे। संसार की चिंताओं से मुक्त! कर्ज़ से लदे हुए। गालियाँ भी खाते, मार भी खाते, मगर कोई गम नहीं। दीं इतने की वसूली की बिल्कुल आशा ना रहने पर भी लोग इन्हें कुछ न कुछ कर्ज़ दे देते थे। मटर, आलू कि फसल में दूसरों के खेतों से मटर या आलू उखाड़ लाते और भून-भूनकर खा लेते या दुस-पांच ईखें उखाड़ लाते और रात को चूसते। घीसू ने इसी आकाश-वृति से साठ साल कि उम्र काट दी और माधव भी सपूत बेटे कि तरह बाप ही के पद चिन्हों पर चल रहा था, बल्कि उसका नाम और भी उजागर कर रहा था। इस वक़्त भी दोनो अलाव के सामने बैठकर आलू भून रहे थे, जो कि किसी खेत से खोद लाए थे। घीसू की स्त्री का तो बहुत दिन हुए देहांत हो गया था। माधव का ब्याह पिछले साल हुआ था। जबसे यह औरत आयी थी, उसने इस खानदान में व्यवस्था की नींव डाली थी और इन दोनो बे-गैरतों का दोजख भारती रहती थी। जब से वोह आयी, यह दोनो और भी आराम तलब हो गए थे। बल्कि कुछ अकडने भी लगे थे। कोई कार्य करने को बुलाता, तो निर्बयाज भाव से दुगनी मजदूरी माँगते। वही औरत आज प्रसव-वेदना से मर रही थी, और यह दोनों शायद इसी इंतज़ार में थे कि वोह मर जाये, तो आराम से सोयें। |
| घीसू ने आलू छीलते हुए कहा- जाकर देख तो, क्या दशा है उसकी? चुड़ैल का फिसाद होगा, और क्या! यहाँ तो ओझा भी एक रुपया माँगता है! |
| माधव तो भय था कि वोह कोठरी में गया, तो घीसू आलू का एक बड़ा भाग साफ कर देगा। बोला- मुझे वहाँ जाते डर लगता है। |
| ‘डर किस बात का है, मैं तो यहाँ हूँ ही।’ ‘तो तुम्ही जाकर देखो ना।’ |
| ‘मेरी औरत जब मरी थी, तो मैं तीन दिन तक उसके पास से हिला तक नही; और फिर मुझसे लजायेगा कि नहीं? जिसका कभी मुँह नही देखा; आज उसका उधडा हुआ बदन देखूं। उसे तन कि सुध भी तो ना होगी। मुझे देख लेगी तो खुलकर हाथ-पाँव भी ना पटक सकेगी!’ |
| ‘मैं सोचता हूँ, कोई बाल बच्चा हुआ, तो क्या होगा? सोंठ, गुड, तेल, कुछ भी तो नही है घर में!’ |
| ‘सब कुछ आ जाएगा। भगवान् दे तो! जो लोग अभी एक पैसा नहीं दे रहे हैं, वो ही कल बुलाकर रुपये देंगे। मेरे नौ लड़के हुए, घर में कभी कुछ ना था, भगवान् ने किसी ना किसी तरह बेडा पार ही लगाया।’ |
| जिस समाज में रात-दिन म्हणत करने वालों कि हालात उनकी हालात से कुछ अच्छी ना थी, और किसानों के मुकाबले में वो लोग, जो किसानों कि दुर्बलताओं से लाभ उठाना जानते थे, कहीँ ज़्यादा सम्पन्न थे, वहाँ इस तरह की मनोवृति का पैदा हो जान कोई अचरज की बात नहीं थी। हम तो कहेंगे, घीसू किसानों से कहीँ ज़्यादा विचारवान था और किसानों के विचार-शुन्य समूह में शामिल होने के बदले बैठक बाजों की कुत्सित मंडळी में जा मिलता था। हाँ, उसमें यह शक्ति ना थी कि बैठक बाजों के नियम और निति का पालन कर्ता। इसलिये जहाँ उसकी मंडळी के और लोग गाव के सरगना और मुखिया बने हुए थे, उस पर सारा गाव ऊँगली उठाता था। फिर भी उसे यह तस्कीन तो थी ही, कि अगर वोह फटेहाल हैं तो उसे किसानों की-सी जी-तोड़ म्हणत तो नही करनी पड़ती, और उसकी सरलता और निरीहता से दुसरे लोग बेजा फायदा तो नही उठाते। दोनो आलू निकल-निकलकर जलते-जलते खाने लगे। कल से कुछ नही खाया था। इतना सब्र ना था कि उन्हें ठण्डा हो जाने दे। कई बार दोनों की ज़बान जल गयी। चिल जाने पर आलू का बहरी हिस्सा बहुत ज़्यादा गरम ना मालूम होता, लेकिन दोनों दांतों के तले पड़ते ही अन्दर का हिस्सा ज़बान, तलक और तालू जला देता था, और उस अंगारे को मुँह में रखेने से ज़्यादा खैरियत तो इसी में थी कि वो अन्दर पहुंच जाये। वहाँ उसे ठण्डा करने के लिए काफी समान था। इसलिये दोनों जल्द-जल्द निगल जाते । हालांकि इस कोशिश में उन्ही आंखों से आँसू निकल आते । |
| घीसू को उस वक़्त ठाकुर कि बरात याद आयी, जिसमें बीस साल पहले वोह गया था। उस दावत में उसे जो तृप्ति मिली थी, वो उसके जीवन में एक याद रखने लायक बात थी, और आज भी उसकी याद ताज़ा थी। |
| बोला- वह भोज नही भूलता। तबसे फिर उस तरह का खाना और भर पेट नही मिला। लड्किवालों ने सबको भरपेट पूड़ीयां खिलायी थी, सबको! |
| छोटे-बडे सबने पूडीयां खायी और असली घी कि! चटनी, रीता, तीन तरह के सूखे साग, एक रसेदार तरकारी, दही, चटनी, मिठाई, अब क्या बताऊँ कि उस भोग में क्या स्वाद मिल, कोई रोक-टोक नहीं थी, जो चीज़ चाहो, मांगो, जितना चाहो खाओ। लोगों ने ऐसा खाया, ऐसा खाया, कि किसी से पानी न पीया गया। मगर परोसने वाले हैं कि पत्तल में गरम-गरम गोल-गोल सुवासित कचौद्दीयां डाल देते हैं। मन करते हैं कि नहीं चाहिऐ, पत्तल को हाथ से रोके हुए हैं, मगर वह हैं कि दिए जाते हैं और जब सबने मुँह धो लिया, तो पान एलैची भी मिली। मगर मुझे पान लेने की कहाँ सुध थी! खङा हुआ ना जाता था। झटपट अपने कम्बल पर जाकर लेट गया। ऐसा दिल दरियाव था वह ठाकुर! |
| माधव नें पदार्थों का मन ही मन मज़ा लेते हुए कहा- अब हमें कोई ऐसा भोजन नही खिलाता। ‘अब कोई क्या खिलायेगा। वह ज़माना दूसरा था। अब तो सबको किफायत सूझती है। शादी-ब्याह में मत खर्च करो। क्रिया-कर्म में मत खर्च करो। पूछों, गरीबों का माल बटोर-बटोर कर कहाँ रखोगे? बटोरने में तो कामं नही है। हाँ , खर्च में किफायती सूझती है। ‘ |
| ‘तुमने बीस-एक पूड़ीयां खायी होंगी?’ |
| ‘बीस से ज़्यादा खायी थी!’ |
| ‘मैं पचास खा जाता!’ |
| ‘पचास से कम मैंने भी ना खायी होगी। अच्छा पट्ठा था । तू तो मेरा आधा भी नही है ।’ |
| आलू खाकर दोनों ने पानी पिया और वहीँ अलाव के सामने अपनी धोतियाँ ओढ़्कर पाँव पेट पर डाले सो रहे। जैसे दो बडे-बडे अजगर गेदुलियाँ मारे पडे हो। |
| और बुधिया अभी तक कराह रही थी। |
| सबेरे माधव ने कोठरी में जाकर देखा, तो उसकी स्त्री ठण्डी हो गयी थी। उसके मुँह पर मक्खियां भिनक रही थी। पथ्रायी हुई आँखें ऊपर टंगी हुई थी । साड़ी देह धुल से लथपथ हो रही थी थी। उसके पेट में बच्चा मर गया था। |
| माधव भागा हुआ घीसू के पास आया। फिर दोनों ज़ोर-ज़ोर से है-है करने और छाती पीटने लगे। पडोस्वालों ने यह रोना धोना सुना, तो दौड हुए आये और पुरानी मर्यादा के अनुसार इन अभागों को समझाने लगे। |
| मगर ज़्यादा रोने-पीटने का अवसर ना था। कफ़न और लकड़ी की फिक्र करनी थी। घर में तो पैसा इस तरह गायब था, जैसे चील के घोसले में मॉस! |
| बाप-बेटे रोते हुए गाव के ज़मिन्दार के पास गए। वह इन दोनों की सूरत से नफरत करते थे। कयी बार इन्हें अपने हाथों से पीट चुके थे। चोरी करने के लिए, वाडे पर काम पर न आने के लिए। पूछा- क्या है बे घिसुआ, रोता क्यों है? अब तो तू कहीँ दिखलायी भी नहीं देता! मालूम होता है, इस गाव में रहना नहीं चाहता। |
| घीसू ने ज़मीन पर सिर रखकर आंखों से आँसू भरे हुए कहा – सरकार! बड़ी विपत्ति में हूँ। माधव कि घर-वाली गुज़र गयी। रात-भर तड़पती रही सरकार! हम दोनों उसके सिरहाने बैठे रहे। दवा दारु जो कुछ हो सका, सब कुछ किया, पर वोह हमें दगा दे गयी। अब कोई एक रोटी देने वाला भी न रह मालिक! तबाह हो गए । घर उजाड़ गया। आपका घुलाम हूँ, अब आपके सिवा कौन उसकी मिटटी पार लगायेगा। हमारे हाथ में जो कुछ था, वोह सब तो दवा दारु में उठ गया…सरकार कि ही दया होगी तो उसकी मिटटी उठेगी। आपके सिवा किसके द्वार पर जाऊं! |
| ज़मीन्दार साहब दयालु थे। मगर घीसू पर दया करना काले कम्बल पर रंग चढाना था। जीं में तो आया, कह दे, चल, दूर हो यहाँ से। यों तोबुलाने से भी नही आता, आज जब गरज पढी तो आकर खुशामद कर रह है। हरामखोर कहीँ का, बदमाश! लेकिन यह क्रोध या दण्ड का अवसर न था। जीं में कूदते हुए दो रुपये निकालकर फ़ेंक दिए। मगर सांत्वना का एक शब्द भी मुँह से न निकला। उसकी तरफ ताका तक नहीं। जैसे सिर के बोझ उतारा हो। जब ज़मींदर साहब ने दो रुपये दिए, तो गाव के बनिए-महाजनों को इनकार का सहस कैसे होता? घीसू ज़मीन्दार का ढिंढोरा भी पीटना जानता था। किसी ने दो आने दिए, किसी ने चार आने। एक घंटे में घीसू और माधव बाज़ार से कफ़न लाने चले। इधर लोग बांस-वांस काटने लगे। |
| गाव की नर्म दिल स्त्रियां आ-आकर लाश देखती थी, और उसकी बेबसी पर दो बूँद आँसू गिराकर चली जाती थी। |
| बाज़ार में पहुंचकर, घीसू बोला – लकड़ी तो उसे जलाने भर कि मिल गयी है, क्यों माधव! माधव बोला – हाँ, लकड़ी तो बहुत है, अब कफ़न चाहिऐ। |
| ‘तो चलो कोई हल्का-सा कफ़न ले लें। |
| ‘हाँ, और क्या! लाश उठते उठते रात हो जायेगी। रात को कफ़न कौन देखता है!’ |
| ‘कैसा बुरा रिवाज है कि जिसे जीते-जीं तन धांकने को चीथ्डा भी न मिले, उसे मरने पर नया कफ़न चाहिऐ।’ |
| ‘कफ़न लाश के साथ जल ही तो जाता है।’ |
| ‘क्या रखा रहता है! यहीं पांच रुपये पहले मिलते, तो कुछ दवा-दारु कर लेते। |
| दोनों एक दुसरे के मॅन कि बात ताड़ रहे थे। बाज़ार में इधर-उधर घुमते रहे। कभी इस बजाज कि दुकान पर गए, कभी उस दुकान पर! तरह-तरह के कपडे, रेशमी और सूती देखे, मगर कुछ जंचा नहीं. यहाँ तक कि शाम हो गयी. तब दोनों न-जाने किस दयवी प्रेरणा से एक मधुशाला के सामने जा पहुंचे और जैसे पूर्व-निश्चित व्यवस्था से अन्दर चले गए. वहाँ ज़रा देर तक दोनों असमंजस में खडे रहे. फिर घीसू ने गड्डी के सामने जाकर कहा- साहूजी, एक बोतल हमें भी देना। उसके बाद कुछ चिखौना आया, तली हुई मछ्ली आयी, और बरामदे में बैठकर शांतिपूर्वक पीने लगे। कई कुज्जियां ताबड़्तोड़ पीने के बाद सुरूर में आ गए. घीसू बोला – कफ़न लगाने से क्या मिलता? आख़िर जल ही तो जाता. कुछ बहु के साथ तो न जाता. माधव आसमान कि तरफ देखकर बोला, मानो देवताओं को अपनी निश्पाप्ता का साक्षी बाना रह हो – दुनिया का दस्तूर है, नहीं लोग बाम्नों को हज़ारों रुपये क्यों दे देते हैं? कौन देखता है, परलोक में मिलता है या नहीं! |
| ‘बडे आदमियों के पास धन है,फूंके. हमारे पास फूंकने को क्या है!’ |
| ‘लेकिन लोगों को जवाब क्या दोगे? लोग पूछेंगे नहीं, कफ़न कहाँ है?’ |
| घीसू हसा – अबे, कह देंगे कि रुपये कंमर से खिसक गए। बहुत ढूंदा, मिले नहीं. लोगों को विश्वास नहीं आएगा, लेकिन फिर वही रुपये देंगे। माधव भी हंसा – इन अनपेक्षित सौभाग्य पर. बोला – बड़ी अच्छी थी बेचारी! मरी तो ख़ूब खिला पिला कर! |
| आधी बोतल से ज़्यादा उड़ गयी। घीसू ने दो सेर पूड़ियाँ मंगायी. चटनी, आचार, कलेजियां. शराबखाने के सामने ही दुकान थी. माधव लपककर दो पत्तलों में सारे सामान ले आया. पूरा डेड रुपया खर्च हो गया. सिर्फ थोड़े से पैसे बच रहे. दोनो इस वक़्त इस शान से बैठे पूड़ियाँ खा रहे थे जैसे जंगल में कोई शेर अपना शिकार उड़ रह हो. न जवाबदेही का खौफ था, न बदनामी का फिक्र. इन सब भावनाओं को उन्होने बहुत पहले ही जीत लिया था. |
| घीसू दार्शनिक भाव से बोला – हमारी आत्म प्रसन्न हो रही है तो क्या उसे पुन्न न होगा? माधव ने श्रध्दा से सिर झुकाकर तस्दीख कि – ज़रूर से ज़रूर होगा. भगवान्, तुम अंतर्यामी हो. उसे बय्कुंथ ले जान. हम दोनो हृदय से आशीर्वाद दे रहे हैं. आज जो भोजन मिल वोह कहीँ उम्र-भर न मिल था. एक क्षण के बाद मॅन में एक शंका जागी. बोला – क्यों दादा, हम लोग भी एक न एक दिन वहाँ जायेंगे ही? घीसू ने इस भोले-भाले सवाल का कुछ उत्तर न दिया. वोह परलोक कि बाते सोचकर इस आनंद में बाधा न डालना चाहता था। |
| ‘जो वहाँ हम लोगों से पूछे कि तुमने हमें कफ़न क्यों नही दिया तो क्या कहेंगे?’ |
| ‘कहेंगे तुम्हारा सिर!’ |
| ‘पूछेगी तो ज़रूर!’ |
| ‘तू कैसे जानता है कि उसे कफ़न न मिलेगा? तू मुझेईसा गधा समझता है? साठ साल क्या दुनिया में घास खोदता रह हूँ? उसको कफ़न मिलेगा और बहुत अच्छा मिलेगा!’ माधव को विश्वास न आया। बोला – कौन देगा? रुपये तो तुमने चाट कर दिए। वह तो मुझसे पूछेगी। उसकी माँग में तो सिन्दूर मैंने डाला था। |
| घीसू गरम होकर बोला – मैं कहता हूँ, उसे कफ़न मिलेगा, तू मानता क्यों नहीं? |
| ‘कौन देगा, बताते क्यों नहीं?’ ‘वही लोग देंगे, जिन्होंने अबकी दिया । हाँ, अबकी रुपये हमारे हाथ न आएंगे। ‘ |
| ज्यों-ज्यों अँधेरा बढता था और सितारों की चमक तेज़ होती थी, मधुशाला, की रोनक भी बढती जाती थी। कोई गाता था, दींग मारता था, कोई अपने संगी के गले लिपट जाता था। कोई अपने दोस्त के मुँह में कुल्हड़ लगाए देता था। वहाँ के वातावरण में सुरूर था, हवा में नशा। कितने तो यहाँ आकर एक चुल्लू में मस्त हो जाते थे। शराब से ज़्यादा यहाँ की हवा उन पर नशा करती थी। जीवन की बाधाये यहाँ खीच लाती थी और कुछ देर के लिए यह भूल जाते थे कि वे जीते हैं कि मरते हैं। या न जीते हैं, न मरते हैं। और यह दोनो बाप बेटे अब भी मज़े ले-लेकर चुस्स्कियां ले रहे थे। सबकी निगाहें इनकी और जमी हुई थी। दोनों कितने भाग्य के बलि हैं! पूरी बोतल बीच में है। |
| भरपेट खाकर माधव ने बची हुई पूडियों का पत्तल उठाकर एक भिखारी को दे दिया, जो खडा इनकी और भूखी आंखों से देख रह था। और देने के गौरव, आनंद, और उल्लास का अपने जीवन में पहली बार अनुभव किया। |
| घीसू ने कहा – ले जा, ख़ूब खा और आर्शीवाद दे। बीवी कि कमायी है, वह तो मर गयी। मगर तेरा आर्शीवाद उसे ज़रूर पहुंचेगा। रोएँ-रोएँ से आर्शीवाद दो, बड़ी गाडी कमायी के पैसे हैं! |
| माधव ने फिर आसमान की तरफ देखकर कहा – वह बैकुंठ में जायेगी दादा, बैकुंठ की रानी बनेगी। |
| घीसू खड़ा हो गया और उल्लास की लहरों में तैरता हुआ बोला – हाँ बीटा, बैकुंठ में जायेगी। किसी को सताया नहीं, किसी को दबाया नहीं। मरते-मरते हमारी जिन्दगी की सबसे बड़ी लालसा पूरी कर गयी। वह न बैकुंठ जायेगी तो क्या मोटे-मोटे लोग जायेंगे, जो गरीबों को दोनों हाथों से लूटते हैं, और अपने पाप को धोने के लिए गंगा में नहाते हैं और मंदिरों में जल चडाते हैं? |
| श्रद्धालुता का यह रंग तुरंत ही बदल गया। अस्थिरता नशे की खासियत है। दु:ख और निराशा का दौरा हुआ। माधव बोला – मगर दादा, बेचारी ने जिन्दगी में बड़ा दु:ख भोगा। कितना दु:ख झेलकर मरी! |
| वह आंखों पर हाथ रखकर रोने लगा, चीखें मार-मारकर। |
| घीसू ने समझाया – क्यों रोता हैं बेटा, खुश हो कि वह माया-जाल से मुक्त हो गई, जंजाल से छूट गयी। बड़ी भाग्यवान थी, इतनी जल्द माया-मोह के बन्धन तोड़ दिए। |
| और दोनों खडे होकर गाने लगे - |
| “ठगिनी क्यों नैना झाम्कावे! ठगिनी …!” |
| पियाक्क्ड्डों की आँखें इनकी और लगी हुई थी और वे दोनो अपने दिल में मस्त गाये जाते थे। फिर दोनों नाचने लगे। उछले भी, कूदे भी। गिरे भी, मटके भी। भाव भी बनाए, अभिनय भी किये, और आख़िर नशे से मदमस्त होकर वहीँ गिर पडे।BY MOBILE DUNIYA |
सदस्यता लें
संदेश (Atom)